ट्रिपल तलाक के केवल कानूनी पहलू पर सुनवाई करेगा सुप्रीम कोर्ट

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supreme court will deal with only legal aspect of triple talaq

Last updated : 14 February, 2017 | India

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को ट्रिपल तलाक और निकाह हलाला के मुद्दों पर एक अहम आदेश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह इन मुद्दों के सिर्फ कानूनी पहलू पर ही सुनवाई करेगा। कोर्ट ने कहा कि ट्रिपल तलाक का मामला मानवाधिकारों (ह्यूमन राइट्स) से जुड़ा है।

रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने इस दौरान ये भी साफ कर दिया है कि इस दौरान वो यूनिफॉर्म सिविल कोड से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई नहीं करेगा क्योंकि ये अलग तरह का मामला है। कोर्ट ने इस मसले से जुड़े सभी पक्षों से कहा है कि वो 16 फरवरी तक तमाम मुद्दों को तय कर लें। मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने यह आदेश जारी किया। बेंच में चीफ जस्टिस जेएस. खेहर, जस्टिस पीवी. रामन्ना और जस्टिस डीवाय. चंद्रचूड़ शामिल थे।

क्या है पूरा मामला?

  • पिछले साल दिसंबर में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ट्रिपल तलाक को असंवैधानिक करार दिया था। इतना ही नहीं कोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से कहा था कि कोई भी पर्सनल लॉ संविधान से ऊपर नहीं हो सकता।
  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत होने वाले डायवोर्स का मसला संसदीय मामला है। इसलिए इस मामले को कोर्ट नहीं देखेगा। हालांकि, कोर्ट ने वकीलों को इस बात की इजाजत जरूर दी कि वो ट्रिपल तलाक से जुड़े कुछ मामलों का जिक्र अपनी जिरह और दस्तावेजों में कर सकते हैं।
  • केंद्र सरकार ने ट्रिपल तलाक, निकाह हलाला और कई शादियों जैसी प्रथाओं का विरोध किया था।
  • केंद्र ने कोर्ट से अपील की थी कि उसे जेंडर इक्विलिटी और सेक्युलिरिज्म के तौर पर इन मामलों को देखना चाहिए।
  • लॉ और जस्टिस मिनिस्ट्री ने संविधान के आधार पर जेंडर इक्विलिटी, सेक्युलरिज्म, निकाह कानून और दूसरे इस्लामिक देशों में इस मामले पर अपनाए जा रहे तरीकों की दलीलें कोर्ट में पेश की थी।
  • ट्रिपल तलाक का लेकर कोर्ट में कई पिटीशंस फाइल की गईं थीं। इनमें से एक सायरा बानो नाम की महिला ने दायर की थी। इसमें उन्होंने ट्रिपल तलाक और ऐसे ही मुद्दों पर कोर्ट से दखल की मांग की थी। उनकी पिटीशन में कहा गया था कि संविधान ने जेंडर इक्विलिटी की इजाजत दी है।
  • ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने केंद्र सरकार की दलीलों का विरोध किया था। उसने इसे मुस्लिमों के मामलों में दखल करार दिया था। इसके अलावा एक और मुस्लिम संगठन जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने भी कोर्ट से कहा था कि मुस्लिम पर्सनल लॉ में दखल नहीं दिया जाना चाहिए। 

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