‘अहिंसा परमोधर्मः’ संदेश देने वाले महावीर आज भी हैं मानवता के मार्गदर्शक

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mahaveer jayanti: these messages to humanity are still relevant, Read...

Last updated : 9 April, 2017 | Feature,Top News

सदियों पहले मानवता को अहिंसा का संदेश देने वाले भगवान महावीर का रविवार को जन्मदिन है। वह जैन समुदाय के लिए ईश्वरतुल्य हैं। आज के युग में जब दुनियाभर में धर्म को लेकर भ्रम की स्थिति बनी हुई है, ऐसे में महावीर का उपदेश सही राह दिखाता है। महावीर ने कहा था- 'धम्मो मंगल मुक्किट्ठं, अहिंसा संजमो तवो' यानि धर्म उत्कृष्ट मंगल है। वह अहिंसा, संयम, तप रूप है। एक धर्म ही रक्षा करने वाला है। धर्म के सिवाय संसार में कोई भी मनुष्य का रक्षक नहीं है। महावीर का पूरा जीवन अपने आपमें एक मिसाल रहा जो जिंदगी के तमाम पड़ावों पर इंसान का मार्गदर्शन करता है। आइए महावीर जयंती पर जानते हैं, भगवान महावीर के बारे में अहम बातें और उनके मानवता के लिए अहम संदेश।

चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को हुआ जन्म

सम्पूर्ण मानवता को अंधकार से प्रकाश की ओर लाने वाले महापुरुष भगवान श्री महावीर स्वामी का जन्म ईसा से 599 वर्ष पूर्व चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में त्रयोदशी तिथि को हुआ था। उनका जन्म बिहार में लिच्छिवी वंश के महाराज श्री सिद्धार्थ और माता त्रिशिला रानी देवी के यहां हुआ। इसलिए हिन्दू और जैन पंचांग के अनुसार, जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर श्री महावीर स्वामी के जन्म-दिवस के अवसर पर चैत्र महीने की शुक्ल-त्रयोदशी के दिन महावीर जयंती मनाई जाती है।

राजपरिवार के वर्द्धमान थे महावीर

भगवान महावीर का जन्म बिहार के वैशाली स्थित के गांव कुंडग्राम में एक राजपरिवार में हुआ था। बचपन में भगवान महावीर स्वामी का नाम वर्द्धमान था। उनके परिवार में ऐशो-आराम, धन-संपदा की कोई कमी नहीं थी। जिसका वे मनचाहा उपभोग भी कर सकते थे किंतु युवावस्था में क़दम रखते ही उन्होंने संसार की माया-मोह, सुख-ऐश्वर्य और राज्य को छोड़कर संन्यासी हो गए।

सन्यासी बनकर पाई इन्द्रियों पर विजय, कहलाए महावीर

जैन धर्म की मान्यताओं के अनुसार, वर्द्धमान ने कठोर तप द्वारा अपनी समस्त इन्द्रियों पर विजय प्राप्त की। जिसके बाद वह जिन कहलाए। जिन का मतलब होता है विजेता। इन्द्रियों को जीतने के कारण वे जितेन्द्रिय कहे जाते हैं। यह कठिन तप पराक्रम के समान माना गया, इसलिए वे ‘महावीर’ कहलाए। उन्हें ‘वीर’, ‘अतिवीर’ और ‘सन्मति’ भी कहा जाता है।

शिक्षा

महावीर ने अपने जीवन पर्यन्त मानवता को तमाम सबक दिए, जो आज भी लोगों का मार्गदर्शन करते हैं। इनमें सबसे अहम शिक्षा है ‘अहिंसा परमोधर्म’। इस सिद्धांत और लोक कल्याण का मार्ग अपना कर विश्व को शांति का सन्देश दिया। महावीर का कहना था कि किसी भी तौर पर इंसान को हिंसा का रास्ता नहीं अपनाना चाहिए। फिर चाहें, हिंसा मन में हो, बोलकर हो या कर्मों में। कहीं भी हिंसा को स्थान नहीं देना चाहिए।

महावीर ने कहा कि आपकी आत्मा से परे कोई भी शत्रु नहीं है। असली शत्रु आपके भीतर रहते हैं, वो शत्रु हैं क्रोध, घमंड, लालच, आसक्ति और नफरत के रूप में आपसे गलत काम कराते हैं। खुद पर विजय प्राप्त करना लाखों शत्रुओं पर विजय पाने से बेहतर है।

महावीर ने बाहरी दुश्मन से लड़ने की बजाय खुदसे लड़ने का सबक दिया। उन्होंने कहा कि जो खुदपर विजय कर लेगा उसे आनंद की प्राप्ति होगी। उनका कहना था कि हर आत्मा स्वयं में सर्वज्ञ और आनंदमय है। आनंद बाहर से नहीं आता। आत्मा अकेले आती है अकेले चली जाती है, न कोई उसका साथ देता है न कोई उसका मित्र बनता है। किसी आत्मा की सबसे बड़ी गलती अपने असल रूप को ना पहचानना है और यह केवल आत्म ज्ञान प्राप्त कर के ठीक की जा सकती है।

आस्तिकता के संबंध में महावीर का विचार था, भगवान का अलग से कोई अस्तित्व नहीं है। हर कोई सही दिशा में सर्वोच्च प्रयास कर के देवत्व प्राप्त कर सकता है। हर जीव स्वतंत्र है, कोई किसी और पर निर्भर नहीं करता। आपात स्थिति में मन को डगमगाना नहीं चाहिए।

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