‘भारत रत्न’ अंबेडकर के दलित मसीहा और देश के नायक बनने की गाथा

Loading the player...

how Bhimrao Ambedkar became Dalit messiah and a national leader, read important facts

Last updated : 13 April, 2017 | Feature,Top News

देश के सर्वोच्‍च सम्‍मान ‘भारत रत्‍न’ से सम्‍मानित दिवंगत डॉ. भीमराव अंबेडकर की शुक्रवार को जयंती है। बाबा साहेब के नाम से लोकप्रिय अंबेडकर की पहचान एक प्रसिद्ध भारतीय वकील, सामाजिक न्‍याय के प्रबल पक्षधर, ओजस्‍वी लेखक, यशस्‍वी वक्‍ता के तौर पर है। जिन्होंने भारतीय संविधान के निर्माण में अहम भूमिका निभाई। अंबेडकर की जयंती पर देशभर में तमाम कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा।

डॉ. अंबेडकर को भारतीय संविधान का जनक माना जाता है। उन्‍होंने हिन्‍दी कोड बिल बनाने में बहुत परिश्रम किया, लेकिन उसे काट-छांट कर पारित किया गया। इससे आहत होकर उन्‍होंने विरोध स्‍वरूप विधि मंत्री के पद से इस्‍तीफा दे दिया। वह जम्‍मू कश्‍मीर को विशेष दर्जा देने वाले भारतीय संविधान के अनुच्‍छेद 370 के खिलाफ थे। इसके अलावा डॉक्‍टर अंबेडकर वायसराय की कार्यकारी परिषद में श्रमिक मामलों के सदस्‍य थे। आइए अंबेडकर की जयंती पर जानते हैं, उनसे जुड़ी कुछ अहम बातें-

  • भारत के पहले विधि एवं न्‍याय मंत्री डॉक्‍टर भीमराव अंबेडकर का जन्‍म 14 अप्रैल, 1891 को मध्‍य प्रदेश के मऊ में हुआ था।
  • भीमराव के माता पिता का नाम भीमाबाई और रामजी था। जिनकी वह 14वीं संतान थे।
  • बचपन में जातिगत असमानता का दंश झेलने वाले अंबेडकर ने एक ऐसे समाज की परिकल्‍पना की थी, जहां सब समान हों, ऊंच-नीच का भेद न हो और सभी गरिमापूर्ण जीवन बिता सकें।
  • इस अहसास ने उन्‍हें निरंतर आगे बढ़ने तथा देश और समाज के लिए कुछ करने की प्रेरणा दी। जिसके बाद अंबेडकर जी ने अपना सारा जीवन समाज के दलित, उपेक्षित और शोषित वर्गों की खुशहाली और उनके स्‍वाभिमान की रक्षा में लगा दिया।
  • अंबेडकर ने वंचित वर्ग को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अधिकार दिलाने की जो कालजयी भूमिका निभाई।
  • बाबा साहेब ने हिन्‍दुओं और मुसलमानों के बीच साम्‍प्रदायिक सद्भाव पर बल दिया।
  • डॉ. अंबेडकर का जन्‍म देहात में हुआ था और वे गांव –देहात के जनजीवन की सोच और जीवन शैली से भलीभांति परिचित थे।
  • विदेशों में शिक्षा प्राप्‍त करने और बड़ौदा के राजा के यहां उच्‍च पद पर आसीन होने के बावजूद वे गांव की मिट्टी की सोंधी महक भूल नहीं पाए।
  • गांवों में छुआछूत, भेदभाव और आर्थिक पिछड़ेपन की स्‍थिति उन्‍हें हमेशा खलती रही। उनका मानना था कि गांव ही भारतीय जीवन की धुरी हैं, अत: सुधार की शुरूआत गांवों से ही होनी चाहिए।
  • डॉ. भीमराव अंबेडकर दलितों के मसीहा, विधिवेत्‍ता, राजनेता, दार्शनिक और मानवतावादी चिंतक तो थे ही, वे प्रखर अर्थशास्‍त्री भी थे। उन्‍होंने न केवल मौद्रिक प्रबंधन पर, बल्‍कि कर संरचना से लेकर स्‍वदेशी अवधारणा और कृषि व उद्योग जैसे अनेक मुद्दों पर विस्‍तृत लेख लिखे।
  • लंदन स्‍कूल ऑफ इकोनॉमिक्‍स में अध्‍ययन के दौरान उनके द्वारा लिखित और 1923 में पुस्‍तक के रूप में प्रकाशित शोध-प्रबंध ‘’The Problem of Rupee” आज भी प्रासंगिक है। यह बाबा साहब की आर्थिक विषयों पर अच्‍छी पकड़ और आर्थिक जगत की दूरदृष्‍टि के साथ मौलिक चिंतन को भी दर्शाती है।
  • उनकी मान्‍यता थी कि आर्थिक सुधारों से भेदभाव मुक्‍त समाज का निर्माण संभव है।उनकी इस पुस्‍तक से भारतीय रिज़र्व बैंक की स्‍थापना और कार्यप्रणाली के लिए कई सुझाव लिए गए। विमुद्रीकरण से सम्‍बन्धित भारत सरकार का ऐतिहासिक निर्णय डॉक्‍टर अंबेडकर की आर्थिक अवधारणा के अनुरूप है।
  • उन्‍हीं की वजह से कारखानों में 12-14 घंटे काम करने का नियम बदलकर सिर्फ आठ घंटे कर दिया गया।
  • डॉ. अंबेडकर व्‍यक्‍ति पूजा के विरोधी थे।

Read More

related stories